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How to cure disease without money?

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बिना पैसे के बीमारी का इलाज कैसे करें?

आज मानवता बहुत कठिन दौर से गुजर रही है. ऐसा लगता है कि जैसे फिजाओं में जहर घुल गया है और इंसान साँस लेने से भी डर रहा है.

एक तरफ तो साँस लेने में भी डर लग रहा है दूसरी तरफ हॉस्पिटल्स में ऑक्सीजन रुपी साँस की कमी के समाचार पढ़-पढ़कर यह डर और बढ़ जाता है.

इस डर और नकारात्मकता का हमारे मन के साथ-साथ शरीर पर बहुत बुरा असर पड़ने लगता है. जब मन में भय और नकारात्मकता बढती है तब हमारा नर्वस सिस्टम यानि दिमाग, उस परिस्थिति से लड़ने के लिए शरीर में कई प्रकार के हारमोंस रिलीज़ करता है.

इन हारमोंस में एड्रेनालीन सबसे प्रमुख है जो हमारे शरीर को फाइट एंड फ्लाइट रेस्पोंस के लिए तैयार कर हमें उस परिस्थिति से लड़ने के लिए तैयार करता हैं.

Fight and flight response in fear

फाइट एंड फ्लाइट रेस्पोंस की परिस्थिति में हमारे शरीर का ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर बढ़ जाता है और इम्युनिटी पॉवर कम हो जाती है.

इसके साथ ही साथ हार्ट और लंग्स की गति बढ़ जाती है, साँस रुक सी जाती है, पसीना आने लगता है, शरीर काँपने लगता है, आँखों की पुतलियाँ फ़ैल जाती है, चेहरा लाल हो जाता है.

इन प्रभावों को आप इस प्रकार समझों जैसे अचानक आपके सामने कोई साँप या जंगली जानवर आ जाए या अचानक हमें कोई डरा दे तब हमारा शरीर जिस प्रकार रियेक्ट करता है वह फाइट एंड फ्लाइट रेस्पोंस है.

हमारे दिमाग ने इस रेस्पोंस को इमरजेंसी में काम में लेने के लिए रखा है ना कि सारे दिन के लिए.

अगर हम दिन रात ऐसे भय के माहौल में रहेंगे तो निश्चित रूप से हमारा दिमाग सारे दिन इसी परिस्थिति से लड़ता रहेगा और सारे दिन हमारे शरीर में उन हारमोंस की अधिकता बनी रहेगी जो नहीं होनी चाहिए.

अगर हम डर और नकारात्मक विचारों की वजह से दिन रात हमारा ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर बढ़ाते रहेंगे और इम्युनिटी को कम करते रहेंगे तो आप अंदाजा लगाइए कि हम हमारे शरीर के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं.

Fear increases tension and create depression

हम किसी बीमारी से तो मरेंगे जब मरेंगे लेकिन चिंता और भय का वातावरण हमें इस परिस्थिति में अवश्य पहुँचा देगा. वैसे भी चिंता को चिता से भी अधिक खतरनाक बताया गया है.

डर और नकारात्मकता से पैदा हुई चिंता डिप्रेशन नामक गंभीर बीमारी को जन्म देती है. एक स्वस्थ दिखने वाला व्यक्ति भी इस डिप्रेशन की वजह से पूरी तरह से अस्वस्थ और बीमार होता है.

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जैसी हमारी सोच होती है वैसा ही हमारा शरीर व्यवहार करता है. अगर हमारे विचार नकारात्मक होते हैं तो हमारा दिमाग उस स्थिति से लड़ने वाले हारमोंस रिलीज़ करता है और अगर हम सकारात्मक सोच रखते हैं तो हमारा दिमाग उसके अनुकूल हारमोंस रिलीज़ करता है.

आपको ये पता होना चाहिए कि अधिकाँश बिमारियाँ हमारे शरीर में इन्ही हारमोंस के असुंतलन की वजह से ही होती हैं. अधिकतर परिस्थियों में इस असुंतलन का कारण हमारी सोच है, हमारे नकारात्मक विचार हैं और हमारा भय है.

Hormonal imbalances during fear

हम आस पास की परिस्थितियों से अधिक प्रभावित होते हैं. जैसा हम सुनते और देखते हैं वो हमारे दिमाग पर कुछ न कुछ असर डालता है. जिस बात से हमें सबसे अधिक डर लगता है वो हमें सबसे अधिक प्रभावित करती है.

यह कई बार साबित हो चुका है कि किसी भी बीमारी का सबसे बड़ा इलाज सकारात्मक सोच और खुद पर विश्वास के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.

अगर आपमें ठीक होने की इच्छा शक्ति है, आपको खुद पर विश्वास है तो कोई भी बीमारी आपका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी लेकिन अगर आप भविष्य के परिणाम से चिंतित होकर डर रहे हैं तो कोई दवाई भी आपको नहीं बचा पायेगी.

Story about fear

इसके सम्बन्ध में एक किस्सा बड़ा मशहूर है. एक बार दो दोस्तों में रात के बारह बजे शमशान में जाकर एक दीवार में कील ठोककर आने की शर्त लगी.

एक दोस्त रात को शर्त पूरी करने गया लेकिन जैसे ही वह कील ठोककर वापस मुड़ा तो पीछे से उसका कुरता किसी ने खींचा. कुरता खींचे जाने से वह इतना अधिक डर गया कि उसकी मृत्यु हो गई.

सुबह जब दूसरा दोस्त वहाँ आया और उसने देखा कि उसका दोस्त मृत पड़ा है और उसका कुरता उसी कील में अटका हुआ है जो उसने ठोकी थी.

कहने का मतलब है वह दोस्त जो इतना बहादुर था जो रात को बारह बजे शमशान में आ गया वह मात्र एक कील के कुरते में फँस जाने से मर गया. यह डर ही था जिसने उसकी जान ली.

हम लोग ऐसे ही जाने अनजाने, सुने अनसुने डर और नकारात्मक विचारों से पूरे दिन घिरे रहते हैं. इसके परिणाम का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं.

मृत्यु से इंसान सिर्फ एक बार मरता है लेकिन डर और चिंता से इंसान हर पल बार-बार मरता है. हमें नकारात्मकता और डर पैदा करने वाले सभी कारणों को समाप्त करना होगा.

वर्तमान कोरोना महामारी के समय में सोशल मीडिया, न्यूज चैनल और समाचार पत्र नकारात्मकता के सबसे बड़े स्त्रोत बन गए हैं. व्हाट्स एप, फेसबुक, ट्विटर पर सारे दिन कोरोना संक्रमण की सूचना फैलती दिखती है.

Fear changes our thought and behaviour

अख़बारों और न्यूज चैनलों पर भी कोरोना संक्रमण के मरीजों की बढती संख्या मन में डर पैदा कर रही है. अख़बारों में किसी मरीज के काले कलर के संक्रमित फेंफडे दिखाए जा रहे हैं.

लोगों को लगता है कि इस बीमारी से उनके फेंफडे भी ऐसे ही हो जायेंगे जबकि हकीकत यह है कि ये परिस्थिति नगण्य संख्या में ही है. ऐसी खबरों और सूचना से निडर आदमी भी भयग्रस्त हो सकता है.

अतः हमें इन प्रकार की खबरों से दूर रहकर अपनी आत्मशक्ति पर भरोसा करना होगा. आज के परिप्रेक्ष्य में मन के हारे हार है और मन के जीते जीत वाली कहावत बिलकुल सत्य प्रतीत हो रही है.

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About Author

Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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